बलबन के प्रारम्भिक जीवन, राज्यारोहण तथा दिल्ली सल्तनत को दृढ़ करने के उपायों का वर्णन – ExamPaper

प्रारम्भिक जीवन

बलबन का वास्तविक नाम बहाउद्दीन था। डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने उसके बारे में लिखा है कि “इल्तुतमिश की भाँति वह भी इल्बारी तुर्क था और उसका पिता 10,000 परिवारों का खान था। किशोरावस्था में उसे मंगोल पकड़कर ले गए और गजनी ले जाकर उन्होंने उसे बसरा के ख्वाजा जमालुद्दीन नामक व्यक्ति को बेंच दिया । ख्वाजा उसे दिल्ली लाया और इल्तुतमिश ने उसे खरीद लिया। यह घटना 1233 ई० में घटी। इल्तुतमिश उसकी बुद्धिमत्ता, वीरता और स्वामिभक्ति से काफी प्रभावित हुआ और उसे तुर्कान-ए-चिहलगानी’ का सदस्य बना दिया। उसने अपनी दो पुत्रियों का विवाह इल्तुतमिश के पुत्र नासिरुद्दीन महमूद और पौत्र मसूदशाह से किया था और नासिरुद्दीन महमूद की पुत्री बलबन के पुत्र बुगरा खाँ से ब्याही गई थी, इस प्रकार वह इल्तुतमिश का करीबी बना। इल्तुतमिश के समय में वह ‘खासदार’ के पद पर पहुँच गया और रजिया के काल में वह ‘अमीरे आखुर’ के पद पर पदोन्नत हुआ। रजिया के विरुद्ध षड़यन्त्र करने वाले तुर्की सरदारों में उसकी सहानुभूति थी। गुईजुद्दीन बहरामशाह ने उसे रेवाड़ी की जागीर प्रदान की। यहाँ उसने अपने प्रशासनिक कौशल का परिचय दिया और जन सामान्य में लोकप्रिय हुआ।

बहरामशाह को हटाकर मसूदशाह को सुल्तान बनवाने में उसका भी सहयोग था। मसूदशाह का ससुर होने के कारण उसकी पदोन्नति हुई, उसे हाँसी की जागीर और ‘अमीर-एहाजिब’ का पद मिला। इस दौरान उसने अपनी शक्ति में वृद्धि की और मसूदशाह को हटाकर 1246 ई० में नासिरुद्दीन महमूद को सुल्तान बनाया गया। 1249 ई० में उसने अपनी पुत्री का विवाह सुल्तान से कर दिया था। सुल्तान ने उसे ‘उलूग खाँ’ की उपाधि व ‘नाइब-ए-मामलिकात’ का पद प्रदान किया। नासिरुद्दीन महमूद सुल्तान के रूप में तत्कालीन राजनीति की अच्छी समझ रखता था, अतः उसने अपनी निःशक्तता को जगजाहिर न करके शासन में अहस्तक्षेप की नीति को जारी रखते हए शासन की समस्त बागडोर बलबन को सौंप चुका था। बलबन ने एक वर्ष छोड़कर सुल्तान महमूद के पूरे शासनकाल में इस पदं को भोगा।

राज्यारोहण (1265) – बलबन ने नासिरुद्दीन महमूद को सुल्तान के रूप में तब तक सहन किया जब तक परिस्थितियाँ पूरी तरह से उसके अनुकूल नहीं हो गई। 1265 ई० में सुल्तान की मृत्यु का रहस्य स्पष्ट नहीं हो सका किन्तु उसकी मृत्यु में सम्भवतः बलबन का हाथ था। अतः बलबन ने सत्ता का अपहरण किया था, जिसका वह कानूनी वारिस नहीं था । बलबन पिछले 20 वर्षों से शासन की बागडोर को अपने हाथों में लिए था, बस सुल्तान की उपाधि ही धारण नहीं की थी। इसके दो कारण थे प्रथम इल्तुतमिश के वंश के प्रति सरदारों की निष्ठा और द्वितीयतः बलबन पूरी तरह से सत्ता सम्हालने के लिए तैयार न था ।

बलबन की कठिनाइयाँ

राज्यारोहण (1265) – बलबन ने नासिरुद्दीन महमूद को सुल्तान के रूप में तब तक सहन किया जब तक परिस्थितियाँ पूरी तरह से उसके अनुकूल नहीं हो गई। 1265 ई० में सुल्तान की मृत्यु का रहस्य स्पष्ट नहीं हो सका किन्तु उसकी मृत्यु में सम्भवतः बलबन का हाथ था। अतः बलबन ने सत्ता का अपहरण किया था, जिसका वह कानूनी वारिस नहीं था । बलबन पिछले 20 वर्षों से शासन की बागडोर को अपने हाथों में लिए था, बस सुल्तान की उपाधि ही धारण नहीं की थी। इसके दो कारण थे प्रथम इल्तुतमिश के वंश के प्रति सरदारों की निष्ठा और द्वितीयतः बलबन पूरी तरह से सत्ता सम्हालने के लिए तैयार न था ।

  1. सुल्तान की पद-प्रतिष्ठा बढ़ाना – इतिहासकार बरनी ने तत्कालीन स्थिति के बारे में लिखा था कि, “शासन-शक्ति का भय जोकि सफल शासन का आधार और राज्य की प्रतिष्ठा और वैभव का स्रोत होता है, सभी व्यक्तियों के हृदय से निकल गया था और देश दुर्दशा की स्थिति में पहुंच गया था। इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद की राजनीतिक उथल-पुथल की स्थिति में उसके द्वारा गठित ‘चालीसा’ की गतिविधियों की बहत हद तक जिम्मेदारी थी। सुल्तान व प्रशासन की पकड़ कम करने में बलबन का योगदान कम न था अतः आवश्यक था कि जिन उपायों के द्वारा बलबन सफल हुआ था, किसी अन्य के लिए वह उन रास्तों को बन्द कर दे और अपनी स्थिति को सुदृढ़ करे।
  1. सल्तनत की सुरक्षा और संगठन करना – बलबन के समक्ष उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों का मूल कारण यही था। उत्तर-पश्चिमी सीमा पर मंगोलों की उपस्थिति के कारण बलबन को उनके विस्तार का भय था । बंगाल का सूबा नासिरुद्दीन के अन्तिम समय में सल्तनत से स्वतन्त्र हो गया था। अन्य प्रांत उसका अनुकरण न करें इसलिए सल्तनत की सत्ता को बंगाल पर सिद्ध करना था। इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद हिन्दू राजाओं की उच्छंखलता बढ़ गई थी। राजस्थान, दोआब, मालवा, बुंदेलखण्ड आदि सभी ऐसे प्रदेश थे जहाँ हिन्दू शासक अपनी शक्ति को पुनः स्थापित और विस्तृत करने का प्रयास कर रहे थे। मेवों (मेवातवासी), कटेहर और दोआब के हिन्दुओं ने तो सल्तनत की सीमा के अन्दर अराजकता फैला रखी थी। इन विद्रोहियों और लुटेरों को नष्ट करना भी राज्य के सम्मान और उसकी सुरक्षा के लिए अत्यन्त आवश्यक हो गया था।

सुल्तान बलबन के कार्य या बलबन द्वारा सल्तनत सुदृढ़ करने के उपाय या ताज की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने के लिए किए गए कार्य

उपरोक्त कठिनाइयों को चुनौती के रूप में बलबन ने स्वीकार किया और यह निश्चय किया कि जो राज्य उसने प्राप्त किया है उसकी सीमाओं की सुरक्षा और राज्य के अन्तर्गत भू-भाग पर जब तक शांति नहीं स्थापित हो जाती वह राज्य विस्तार नहीं करेगा। बलबन ने इस बारे में कहा कि, “जब तक अपना राज्य अरक्षित है तब तक विदेशी भूमि पर आक्रमण करने की अपेक्षा अपने ही राज्य में शान्ति स्थापित करना अधिक श्रेयस्कर है। उसने सल्तनत की नई परिभाषा दी, इसके लिए उसने निम्न कार्य किए . .

  • बलबन का राजत्व सिद्धान्त – बलबन ने सुल्तान के पद और अधिकारों की नई व्याख्या दी जिससे इस पद और व्यवस्था के प्रति सम्मान व भय बना रहे। प्रो० के. ए. निजामी ने इसकी आवश्यकता के बारे में लिखा है कि, “यह सुल्तान के सम्मान में वृद्धि करने के लिए आवश्यक था परन्तु इसका एक कारण उसकी हीनता की भावना भी थी जिसके कारण वह अपने विचारों को निरन्तर व्यक्त करके अपने सरदारों को यह विश्वास दिलाना चाहता था कि वह किसी हत्यारे के छुरे या जहर के प्याले के कारण सुल्तान नहीं बना बल्कि ईश्वर की इच्छा के कारण बना है।” तत्कालीन किसी भी स्रोत से उसके दासता से मुक्ति का ज्ञान नहीं मिलता सम्भवतः इसी काननी अवैधता पर आवरण डालने के लिए उसने इस पद को ईश्वर प्रदत्त होने का स्वाग किया। पद के ईश्वर प्रदत्त होने के कारण कोई भी शासक की निरंकुशता के विरुद्ध प्रश्न नहीं उठा सकता था। बलबन ने स्वयं कहा कि, “सुल्तान पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि (नियाबत खदाई) है और उसका स्थान केवल पैगम्बर के पश्चात् है। शक्ति ईश्वर से प्राप्त होती है। इस कारण जनसाधारण या सरदारों को उसके कार्यों की आलोचना करने का अधिकार नहीं है। सुल्तान का पद निरंकुशता का सजीव प्रतीक है।” इन सिद्धान्तों को बलबन ने आचरण में लिया। उसने अपने को फिरदौसी के शाहनामा में वर्णित काल्पनिक वीर अफरासियाब का वंशज बताया और सुल्तान पद की महत्ता के लिए गम्भीरता और एकांतवास का आवरण ओढ़ लिया। छोटे सरदारों और निम्न जाति के मसलमानों व भारतीय मुसलमान व हिन्दुओं से मिलना बन्द कर दिया। वह सदैव पूरी राजसी पोशाक में रहता था। उसके अंगरक्षक सदैव नंगी तलवारें लिए भयानक प्रतीत होते थे। उसने स्वयं शराब पीना बन्द कर दिया और दरबार में हास-परिहास वे मनोरंजन पर पाबन्दी लगा दी।
  1. चालीसा मण्डल की समाप्ति – इल्तुतमिश ने प्रमुख ती सरदारों को अशक्त करने के लिए अपने चालीस गुलामों को प्रशासन व सेना के स्तर पर प्रोन्नत कर एक नया वर्ग बनाया था जो उसका अनुयायी था। इल्तुतमिश की मृत्यू के बाद के सुल्तानों ने नाममात्र की राजसत्ता भोगी और मुख्य लगाम इन्हीं चालीसा वर्ग के पास ही रही। बलबन स्वयं भी उसी मण्डल का सदस्य था। बलबन की निरंकुश सल्तनत की महत्वाकांक्षा के मार्ग में अन्य सरदार बाधक बन सकते थे, अतः बलबन ने इनके विनष्टीकरण की कार्ययोजना बनाई । बलबन ने नासिरुद्दीन के नायब के रूप में ही इस दिशा में कार्य आरम्भ कर दिया था और अपने प्रतिद्वन्द्वी सरदारों को मौत के घाट उतार दिया था। सुल्तान बनने के बाद अपने और अपने वंशजों के हित के लिए उसने निम्न कोटि के सरदारों को प्रोन्नत कर इनके बराबर का ओहदा दिया। इसके बाद उसने छोटी-छोटी बात पर इन सरदारों को इतनी कठोर सजा दी कि वे मर गए। यहाँ तक कि बलबन ने अपने चचेरे भाई शेरखाँ, जो इस गुट का योग्य व प्रमुख सदस्य था, को जहर देकर मरवा दिया। उसके बाद कोई अन्य सरदार उसकी महत्वाकांक्षा के मार्ग में बाधक बनने योग्य न रह गया था। जो सदस्य मरने और पदच्युत होने से बच गए उनका बलबन ने कठोरता से दमन . किया।
  2. गुप्तचर विभाग और प्रशासनिक संगठन – मंगोल आक्रमण के भय और आन्तरिक समस्याओं के कारण बलबन ने सल्तनत में ऐसी व्यवस्था की जिससे प्रत्येक प्रान्त, सूबे, जिले, परगने पर उसकी नजर रहे। इस हेतु उसने राजभक्त प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति की – और इसमें उसने स्वयं हस्तक्षेप किया। किसी भी भारतीय व निम्न जाति के मुसलमान को नियुक्त नहीं किया, हिन्दू तो सम्भवहीन थे। ‘नाइब’ जैसा पद समाप्त हो गया और वजीर के अधिकारों में काफी कमी कर दी गई। उसकी प्रशासनिक सुदृढ़ता का आधार उसकी गुप्तचर व्यवस्था थी। उसने प्रत्येक प्रान्त, पदाधिकारी, यहाँ तक कि अपने पुत्रों पर नजर रखने के लिए गुप्तचर नियुक्त किए। इसमें उसने स्वयं देखरेख की। बलबन ने इन गुप्तचरों को आकर्षक वेतन दिए और उनसे अपेक्षा की कि वे प्रत्येक दिन की खबर उस तक पहुंचाएं। सभी गुप्तचर बलबन से एकान्त में मिलते थे। इस प्रकार बलबन ने एक अच्छे किस्म का गुप्तचर विभाग संगठित किया।
  3. सेना का संगठन – आंतरिक बाह्य खतरों और बलबन की निरंकुशता की महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए सेना की सुदृढ़ीकरण आवश्यक था। उसने सेना की संख्या में वृद्धि की और विदेशी मूल के लोगों को वरीयता दी। उसने उनके वेतन में वृद्धि की यद्यपि वेतन अभी भी नगद न होकर जागीर की राजस्व के रूप में मिलता था। उसने सेना के काम न आ रहे वृद्धों और उनके आश्रितों से जागीरें छीनने का मन बनाया किन्तु दिल्ली के कोतवाल के दबाव के कारण वह ऐसा नहीं कर सका। बलबन ने सेना के लिए एक अलग विभाग ‘आरिजे-मुमालिक की नियुक्ति की और वजीर के नियन्त्रण से मुक्त कर दिया, जिससे सेना को धन की कमी न पड़े। ‘वह स्वयं सैन्य आक्रमण की रणनीति बनाता था और उसने सेना को दुर्बलों व किसानों को नुकसान न पहँचाने का आदेश दे रखा था। इक्तादारों और सरदारों को अपनी सेना की व्यवस्था का अधिकार स्वयं था । यद्यपि बलबन सैन्य संगठन के दोषों को समाप्त नहीं कर पाया किन्तु इसके समय में सेना की शक्ति में निःसंदेह वृद्धि हुई थी।
  1. विद्रोहों का दमन – बलबन ने विस्तार की नीति नहीं अपनाई बल्कि वह मात्र उसी भू-भाग को पुनः विजित और सुदृढ़ करने में लगा रहा। यदि वह राज्य विस्तार में लग जाता तो अधीनस्थ हिन्दू राजाओं के विद्रोह और मंगोलों के आक्रमण का भय उत्पन्न हो जाता। वास्तव में बलबन के सुल्तान बनने तक अधिकांश भागों से भारतीयों ने तुर्की सत्ता को अमान्य कर दिया था और तुर्की शासकों व सैनिकों को मार भगाया था। दोआब, अवध कटेहर (आधुनिक रुहेलखण्ड), बदायूँ, अमरोहा, पटियाली, कम्पिल आदि विद्रोहियों के गढ़ थे। वे प्रतिदिन दिल्ली की जनता को लूटते थे। मेवों के भय से पश्चिमी दिल्ली का दरवाजा दोपहर की नमाज के बाद बन्द कर दिया जाता था। बंगाल, बिहार, राजस्थान आदि दूरवर्ती प्रदेशों में इससे भी अधिक खराब दशा थी।
  2. बंगाल-विजय – बंगाल, सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद के समय स्वतन्त्र हो गया था। किन्तु सुल्तान बनने के बाद बलबन की शान में बंगाल झुक गया तथा तुगरिल खाँ को बंगाल का इक्तादार बनाया गया। बलबन के बड़े पुत्र की मृत्यु, मंगोल आक्रमण का भय और सुल्तान बलबन की बढ़ती आयु से मौका पाकर तुगरिल खाँ ने 1279 ई० में ‘सुल्तान मुगीसुद्दीन’ की उपाधि धारण की, खुतबा पढ़वाया और सिक्के जारी किए। बलबन ने अवध के इक्तादार अमीन खाँ, तिरमिती और बाद में एक अन्य अभियान शहाबुद्दीन के नेतृत्व में बंगाल के विरुद्ध कराया किन्तु असफलता ही हाथ लगी। सल्तनत की सुदृढ़ता पर लगे प्रश्न चिन्ह को समाप्त करने के लिए मंगोल भय के बावजूद 80 वर्ष की आयु में स्वयं एक बड़ी सेना के साथ बंगाल की ओर रुख किया। बलबन ने बड़ी क्रूरता से तुगरिल के विद्रोह को समाप्त किया और उसके स्थान पर अपने छोटे पुत्र बुगरा खाँ को बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया। वृद्धावस्था में बंगाल के विरुद्ध किए गए। सैनिक अभियान का बलबन के स्वास्थ्य पर बहुत अधिक दुष्प्रभाव पड़ा। उसे बंगाल में व्यवस्था स्थापित करने में तीन वर्ष लगे और इसके बाद ही वह दिल्ली आ सका।

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