इल्तुतमिस की प्रारंभिक कठिनायों का वर्णन – ExamPaper

शम्स-उद-दीन इल्तुतमिश (1211-1236 ई०)

प्रारम्भिक जीवन – शम्सददीन इल्तुतमिश इल्बरी कबीले का तुर्क था। उसका पिता कबीले का सरदार था और इल्तुतमिश को बहुत चाहता था, अतः ईर्ष्यावश उसके भाइयों ने उसे गुलामों के व्यापारी को बेच दिया। कई स्वामी बदलने के बाद वह ऐबक द्वारा खरीदा गया। वह सुन्दर, शिक्षित, साहसी व वीर सैनिक था। अपनी योग्यता के बल पर वह उन्नति करते हुए “सरे-जाँदार” (अंगरक्षकों का प्रधान) ‘अमीरे शिकार’, ग्वालियर विजय के बाद वहाँ का किलेदार और फिर बरन (बुलन्दशहर) का सूबेदार बना जो दिल्ली सल्तनत का सबसे महत्वपूर्ण सूबा था। बाद में बदायूँ का किला भी उसे सौंप दिया गया। ऐबक ने अपनी पुत्री का विवाह उससे किया था। ऐबक ने उसे अपने जीवन में ही दासता से मुक्त कर दिया था, ऐसा खोक्खर जाति के विद्रोह दमन के समय उसके द्वारा दिए गए वीरता के परिचय के कारण (1205-1206 ई. में) हो सका था । ऐबक की मृत्यु के समय वह बदायूँ में था। लाहौर में आरामशाह को सुल्तान बनाया गया था। दिल्ली के तुर्की सरदारों ने उसे दिल्ली आने के लिए आमन्त्रित किया और उसने दिल्ली में अपने सुल्तान होने की घोषणा की। 1211 में उसने आरामशाह को परास्त कर वध कर दिया और औपचारिक रूप से सत्ता अधिग्रहण की।

कठिनाइयाँ

  1. विद्रोही सरदार – इल्तुतमिश ऐबक का पुत्र तो था नहीं, अतः सत्ता का वह वैधानिक उत्तराधिकारी नहीं था। दूसरी तरफ तुर्की सरदारों का सर्वमान्य नेता भी वह नहीं था। इसका प्रथम प्रमाण तो लाहौर में आरामशाह को सुल्तान बनाकर दे दिया गया था। इल्तुतमिश ने जब अपने समर्थकों की सहायता से आरामशाह को परास्त कर लिया तो दूसरी बार दिल्ली वापस आने पर उसके नेतृत्व को असन्तोषी तुर्की सरदारों ने उसके विरुद्ध कार्य शुरू किया और दिल्ली से बाहर चले गए। यद्यपि इल्तुतमिश ने जूद के युद्ध में इन सबको एक साथ परास्त किया किन्तु उसके पूरे शासन काल में यह सन्देह और गुटबाजी का दौर चलता रहा।
  2. गजनी का दावा – गजनी का शासक ताजुद्दीन इल्दौज भारत के तुर्की राज्य को अपने अधीन समझता था। ऐबक से युद्ध कर वह परास्त भी हुआ। ऐबक उसका दामाद भी था इसके विपरीत उसे इल्तुतमिश से सीधा कोई सम्बन्ध न होने के कारण कोई सहृदयता नहीं थी। ख्वारिज्म के शाह के निरन्तर दबाव के कारण भी वह पंजाब की तरफ आना चाहता था, जो इल्तुतमिश के हित में न था। इन परिस्थितियों में गजनी व दिल्ली के शासकों के मध्य युद्ध व शत्रुता निश्चित थी।
  3. नासिरुद्दीन कुबाचा का भय – कुबाचा भी ऐबक का समानपदी था और भारत के तर्की राज्य को अपने अधीन समझता था। उसने ऐबक से कभी युद्ध तो नहीं किया था किन्त ततमिश को संकटों से घिरा देखकर उसने उच्छ, सिन्ध, मुल्तान, भटिण्डा, कुहराम व सरस्वती पर अधिकार कर लिया। ऐसे में कुबाचा से युद्ध निश्चित-सा था।
  4. आंतरिक संकट – दिल्ली का सुल्तान बनने के समय उसे विरासत में बनारस से शिवालिक की पहाड़ियों तक का छोटा सा राज्य मिला था।
  5. मंगोल – आक्रमण का भय मंगोल अपने नेता चंगेज खाँ के नेतृत्व में मध्य एशिया में विभिन्न राजवशो को इतिहास बना रहे थ। ख्वारिज्म के शाह के भारत की तरफ भागने पर भी चंगेज खाँ के आक्रमण का भय बन गया था।

इल्तुतमिश द्वारा किए गए कार्य या उपलब्धियाँ

  1. तुर्कान-ए-चिहालगानी का संगठन – सत्ता सम्हालते समय कुतबी (ऐबक समर्थक) व मुइज्जी (गोरी समर्थक) सरदारों द्वारा किए गए विरोध के कारण उसने इस नए गुट का निर्माण किया। यह गुट वास्तव में उसके गुलामों का गुट था जो उसके प्रति निष्ठावान था। शासन के प्रमुख पदों पर उसने इन्हीं को नियुक्त किया।
  2. इल्दौज पर विजय – सुल्तान बनते समय इल्तुतमिश को इल्दौज ने अधीन शासक मानते हुए छत्र व ध्वज प्रदान किया। इल्तुतमिश ने तत्काल विरोध न कर अपनी राजधानी के आस-पास और पश्चिमी सीमा पर भटिण्डा, कुहराम, सरस्वती आदि को जीतकर अपनी स्थिति सुदृढ़ की। 1215 ई. में ख्खारिज्म के शाह से परास्त होकर इल्दौज लाहौर भाग आया और थानेश्वर तक का पंजाब प्रदेश जीत लिया और दिल्ली सिंहासन पर अधिकार जताया। इल्तुतमिश ने 1215-16 ई० में तराइन के युद्ध में उसे युद्ध में परास्त कर कैद कर लिया। उसे बदायूँ में कैद कर दिया गया जहाँ उसका वध कर दिया गया । इस प्रकार गजनी से दिल्ली सल्तनत सदैव के लिए मुक्त हो गई।
  3. मंगोल आक्रमण का भय – मंगोल चंगेज खाँ के नेतृत्व में युद्धरत थे। उन्होंने ख्वारिज्म के शहजादे जलालुद्दीन माँगबर्नी को परास्त कर दिया था। माँगबर्नी ने भारत की तरफ भाग कर प्राण बचाए और इल्तुतमिश से सहायता की माँग की। उसकी सहायता का अर्थ चंगेज खाँ को आक्रमण के लिए न्योता देना था। इल्तुतनिश ने जब तक माँगबर्नी भारत में रहा उसकी कोई सहायता न की। माँगबर्नी सिन्ध को लूटकर कुबाचा से युद्ध करके पर्शिया चला गया | चंगेज खाँ के जीवित रहते इल्तुतमिश ने उत्तर-पश्चिमी सीमा पर किलेबंदी तक नहीं की और इस प्रकार नवविजित तुर्की साम्राज्य को मंगोल तूफान से बचा लिया ।
  4. कुबाचा पर विजय – गोरी के समय में उसे उच्छ की सूबेदारी दी गई थी किन्तु | उसने इल्तुतमिश की कठिनाइयों से लाभ उठाकर सिन्ध, भटिण्डा, मुल्तान, सरस्वती व लाहौर जीत लिया था। इल्दौज ने लाहौर उससे छीना था जो 1215 में कुबाचा ने पुनः जीत लिया। इल्तुतमिश ने 1217 ई० में लाहौर जीत लिया। माँगबर्नी ने भारत छोड़ने के पहले कुबाचा की शक्ति को काफी नुकसान पहुँचाया था।
  5. बंगाल विजय – ऐबक के समय के सूबेदार अलीमर्दीन खाँ ने स्वतन्त्र सत्ता स्थापित की। उसकी हत्या कर हुसामुद्दीन एवाज ने सत्ता सम्हाली और बिहार को भी बंगाल में मिला लिया। इल्तुतमिश पश्चिमोत्तर में व्यस्त था अतः समय मिलते ही 1205 ई० में उसने अपने पुत्र नासिरुद्दीन महमूद को बंगाल विजय का आदेश किया। शहजादे नासिरुद्दीन की 1229 में मृत्यु हो गई जिससे वहाँ के सूबेदार बख्तियारुद्दीन बल्का खिलजी ने स्वतंत्र रूप से कार्य करना शुरू किया। 1229 में इल्तुतमिश स्वयं बंगाल गया और युद्ध किया और बंगाल को पुनः सल्तनत में मिला लिया । इल्तुतमिश ने इस प्रान्त को दो भागों बंगाल व बिहार में बाँट दिया जिससे शक्ति बॅट गई और यह इल्ततमिश के जीवन भर सल्तनत का हिस्सा रहा।
  6. हिन्दू शासकों के विद्रोह-दमन – ऐबक के काल में काफी भू-भाग हिन्दू राजपूत जाआन पुनः जीत लिया था। इल्तुतमिश के लिए जीते गए भू-भाग को पुनः जीतना एक काम या। उसन 1226 ई० में रणथम्भौर बयाना, यंगीर, अजमेर, नागौर आदि क्षेत्र जीत लिए। 1229 २० म जालोर ने अधीनता स्वीकार कर ली। 1231 ई० में ग्वालियर जीत लिया गया। 1233-34 ३० म कालिजर जीत लिया परन्त गजरात व नागदा के गहिलौतों को न जीत सका। 1234-35 २० म मालवा में लूट-पाट की। गंगा-यमुना के दोआब में कटेहर, बदायूँ, कन्नौज, बनारस व बहराइच को फिर से जीता और अवध को सल्तनत में मिला लिया । यद्यपि अभी भी राजपत सशक्त थे, जैसे-गुहिलौतों और गुजरात के चालुक्यों की शक्ति, बूंदी का स्वतन्त्र होना, चन्देलों राज्य का झाँसी तक होना आदि, फिर भी इल्तुतमिश ने तुर्की सत्ता द्वारा जीते प्रदेश में पनः । स्थापित की और हिन्दू शासकों की सार्वभौम सत्ता को हद दर्जे तक प्रभावित किया।
  1. खलीफा से सल्तान का पद पाना – गजनी की सत्ता से मुक्ति के बाद इल्ततमिश बगदाद के खलीफा से अपनी सल्तनत व अपने सुल्तान पद की स्वीकृति की सिफारिश की। फरवरी, 1229 ई० में खलीफा ने ऐसा स्वीकृति पत्र अपने प्रतिनिधि के साथ दिल्ली भेजा। और इस प्रकार दिल्ली सल्तनत और सुल्तान का पद पूर्ण रूप से वैधानिक और संप्रभु हो गया।
  2. प्रशासनिक कार्य – इल्तुतमिश ने ‘इक्ता’ का गठन किया । यह एक प्रकार के प्रान्त थे और यही प्रशासन का आधार बनाए गए। उसने सिक्के भी जारी किए | चाँदी का सिक्का-टंका और ताँबे का सिक्का जीतल कहलाया। उसने एक बड़ी सेना को केन्द्र में रखा जो संकट के समय काम आ सके। इल्तुतमिश ने राजधानी दिल्ली को बनाया जिससे पश्चिमोत्तर के खतरों से बचा जा सके।

इल्तुतमिश एक विजेता और शासक के रूप में

इल्तुतमिश ने जब सत्ता सम्हाली तब न तो उसे भारत के देशी तत्वों न तुर्की सरदारों और न ही ऐबक की भाँति गोरी जैसा कोई बाहरी समर्थन प्राप्त था। यहाँ तक कि वह ऐबक का दामाद था न कि पुत्र । ऐबक ने सत्ता की कोई परिभाषा या परम्परा भी नहीं डाली थी जिसका वह अनुसरण करता । कुबाचा, इल्दौज के अलावा माँगबर्नी और चंगेज का भय तो था ही। भारत के वे देशी राजपूत शासक जो गोरी के जीवन काल में परास्त किए गए थे, पुनः स्वतन्त्रता के प्रति प्रतिबद्ध थे। भारत में तुर्की सरदारों का भी कोई सर्वमान्य नेता नहीं था अतः वे इल्तुतमिश के विरोध के लिए पूरी तरह स्वतन्त्र थे। ऐसी परिस्थितियाँ थीं कि भारत की जनता इस सैनिकशाही को जो धार्मिकता से निर्देशित होती थी, से सामंजस्य नहीं बना पाई थी। ऐसे समय में इल्तुतमिश ने सत्ता तलवार के बल पर अधिग्रहीत की। उसने 26 वर्ष शासन किया। इस दौरान उसने असीम साहस, वीरता, बुद्धिमत्ता व कूटनीति का सहारा लिया। विदेशी सरदारों का एक समर्थक गुट तैयार किया गया जो उसके प्रति निष्ठावान था। खलीफा से सल्तनत व सुल्तान के पद को वैधानिक मान्यता दिलाई। भारतीय हिन्दू शासकों को तलवार व बुद्धि से परास्त किया । बंगाल के विद्रोह को दबाया व सल्तनत का एक सूबा बनाया।

उसने मात्र सैनिक अभियानों में ही अपना शासनकाल नहीं लगाया वरन् उसने प्रशासनिक सदढीकरण में भी कार्य किया। इल्तुतमिश ने ‘इक्ता प्रथा की शुरूआत की। ये इक्ताएं प्रशासनिक इकाई के रूप में थीं। इक्ता के प्रमुख सैन्य अधिकारी होते थे जो इनमें शान्ति, प्रशासन सम्बन्धी कार्य तथा राजस्व वसूलने का कार्य करते थे। वे इसी राजस्व से सेना का गठन करते थे जो केन्द्र के संकट के समय काम आते थे। इक्ता की व्यवस्था को स्थापित करने में इल्तुतमिश के दो उददेश्य थे – एक तो विजित प्रदेशों पर नियन्त्रण रखा जा सके और दूसरे भारतीय हिन्दू सामन्तों की सत्ता व शक्ति को ह्रासमान बनाया जा सके। उसने सेना को इक्ता के प्रमुखों के अधीन भी रखा किन्त भर्ती, वेतन आदि का उत्तरदायित्व केन्द्रीय सरकार का था । इक्ता गठन का उददेश्य उस सरदार के अधीन सेना के वेतन खर्च के आधार पर निर्धारित करना ।

इल्तुतमिश गुलाम वंश के संस्थापक के रूप में तमिश गलामवंश ही नहीं वरन् भारत में तुकी राज्य का भी संस्थापक था। “ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की रूपरेखा के बारे में सिर्फ दिमागी आकृति बनायी थी, इल्तुतमिश ने उसे एक व्यक्तित्व, एक पद, एक प्रेरणा-शक्ति, एक दिशा, एक शासन व्यवस्था और एक शासक-वर्ग प्रदान किया। उसने गोरी द्वारा भारत में विजित और कमजोर तरीके से जोड़े गए प्रदेशों के समूह को सुनियोजित एवं संगठित राज्य ‘दिल्ली सल्तनत’ में परिवर्तित कर दिया। उसने एक सामंत वर्ग चालीसा का गठन किया। उसने सुल्तान के पद को वंशानुगत कराया। उसके द्वारा स्थापित राज्य अगले पचास वर्षों तक यथावत् रहा। सामन्तों का केन्द्रीय सत्ता के प्रति विद्रोह न करना उसकी सल्तनत स्थापना की सफलता थी।

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